Friday, November 23, 2007

आज सब पहरेदार

आज सब पहरेदार ...
बस
मैं ही गुनाहगार ...
इस मतवाली सी फिजा मैं सब खरपतवार ...
दूब शांट ये नही बाबा हमे है इनसे इंकार ...
करो जल्दी से प्यार का इजहार ....
फिर होंगे घर वाले तैयार ....
या
बना लो राखी का त्यौहार ...
खफा
होना है बेकार ...
रात
के चंद को ही ले लो .....
कितनी
काली हो ये रात पर उसको तो निकलना है ...
उसको पता है उसकी रात कल के प्रभात तक ही जीवित रहेगी......
पर वो हर रात नयी रात के सपने लेकर रुप बदल कर ...
आकर
बदल कर ...
हौसला
ही जीवन का आधार है ...
आज
सब पहरेदार है...

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