Tuesday, December 11, 2007

क्या मेमोरी का फॉर्मेट possible है ?

सोचो अगर हम अपने दिमाग को भी कंप्यूटर के जसे फॉर्मेट कर सकते ? यार सभी दुंधली यादो को फ़ाइल के जसे एडिट कर पाते ? खराब यादों को निकाल बाहर करते , उनकी जगह अपने पसंद के ख्वाबों को जगह दे कर , शायद सपनो को भी हम पहले से ही प्ले लिस्ट में add कर लेते ताकि कोई अपने मन मुताबिक देखा जा सके ? अगर आप भी ऐसा सोचते है तो जरूर इस विषय पर चर्चा करें और अपना सुझाव अवश्य दें।
चलो इसे एक सवाल रखते हुए मैं यहीं से आगे शुरू करूँगा ..

Friday, November 23, 2007

आज सब पहरेदार

आज सब पहरेदार ...
बस
मैं ही गुनाहगार ...
इस मतवाली सी फिजा मैं सब खरपतवार ...
दूब शांट ये नही बाबा हमे है इनसे इंकार ...
करो जल्दी से प्यार का इजहार ....
फिर होंगे घर वाले तैयार ....
या
बना लो राखी का त्यौहार ...
खफा
होना है बेकार ...
रात
के चंद को ही ले लो .....
कितनी
काली हो ये रात पर उसको तो निकलना है ...
उसको पता है उसकी रात कल के प्रभात तक ही जीवित रहेगी......
पर वो हर रात नयी रात के सपने लेकर रुप बदल कर ...
आकर
बदल कर ...
हौसला
ही जीवन का आधार है ...
आज
सब पहरेदार है...

Saturday, November 3, 2007

गूगल देवता तू ही तू नज़र आए

तू ही तू नज़र आए


हमे सब तरफ़ एक तू ही तू नज़र आए
दिल तलाशता है जिस मंज़र को वो नज़र तो आए


हम छोड़ देंगे पीना जाम से सनम
पहले तेरी आँखो में हमे मय मोहब्बत की तो नज़र आए

तय कर लेंगे हम तेरे साथ यह इशक़ का सफ़र
पर तेरे साथ हमे अपनी मंज़िल भी तो कोई दिखाए

निभा दी हैं हमने तो मोहब्बत की सब रस्मे
तेरी बातो से भी हमे कुछ वफ़ा की महक तो आए

सो जाएँगे तेरे बाहों के घेरे में हम सकूँ की नींद
पर तुझे भी तो कभी हमारी याद इस तरह शिद्दत से आए!!